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Friday, December 07, 2012

चाशनी..

निगाहो में जिसके सहर रहती है, वो रोशनी हो तुम,
लबों से लब्ज़ो में मिठास भरती है, वो चाशनी हो तुम..

मासूम वक़्त को फिर ले आती, एक सुहानी मुस्कान हो तुम,
कभी सयानी, कभी दिवानी, कभी लगती नादान हो तुम..

पेड़ के हर पत्ते से बचकर मुझे छुने आयी, एक अनछुई किरन हो तुम,
कभी पत्थरों में फुलों की उम्मीद जगाती, बारिश की पहली सीलन हो तुम..

जिसने मेहकाया है इस गुलशन को आजकल, वो संदल हो तुम,
मेरी कलम से शरारत करती, पर्दानशी, हसीन गज़ल हो तुम..

जहाँ मेरे साथ थम गया था वक़्त, उस मोड पर मिले हो तुम,
शायद वक़्त को इंतजार था तुम्हारा, इससे पहले भी कहीं मिले हो तुम..

- मेरी नादानगी

Saturday, July 30, 2011

शाम भी चुपचाप सी रहती है..

दिनभर की धूप में जलकर सुस्त पड़ी सडकों को देखते हुए, शाम भी कुछ चुपचाप सी रहती है।
सूने किसी घर में, तनहा जलती हुई इक शमा की तरह, दिल में भी कुछ आग सी रहती है।

सुन्न हो गये कानों के परदे, झुकीसी आंखे और दबी सी सांसो में भी कोई जिंदगी सी रहती है।
इस शोर से छुपती छुपाती, दिल के अंधे गलियारों में, सेहमी सी कोई, दिल्लगी सी रहती है।

इक आह लबों के दायरे के भीतर रहती है, उनकी बेज़ार निगाहों में कुछ धुंद सी रहती है।
ऐसे रहती है इक कसक सी सीने में बेचैन, जैसे पैमानों में कुछ आग सी रहती है।

किसीकी झूठी प्यास बुझाती हुई, खुद प्यासी रह जाती है, ये मै भी अब 'नादान' सी रहती है।
इस महफ़िल में भीड़ का दिल बहलाती हुई, ये मधुशाला भी अब वीरान सी रहती है।

- मेरी नादानगी.